गेर-हिन्दीभाषी क्षेत्र में हिन्दी भाषा के विकास के समक्ष चुनौतियां

 

हिंदी निबंध लेखन प्रतियोगिता- 2021(गेर-हिन्दीभाषी अधिकारी)
 

बिषय: गेर-हिन्दीभाषी क्षेत्र में हिन्दी भाषा के विकास के समक्ष चुनौतियां

 

हिंदी भारतीय सभ्यता, संस्कृति और समाज की भाषा है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इक्कीसवीं सदी में कोई भी भाषा ऐसी नहीं है, जिसको चुनौतियां का सामना नहीं करना पड़ रहा। हालांकि किसी भाषा के सामने चुनौतियां कम है और किसी के सामने ज्यादा हैं। आज हम सभी जानते हैं कि हिंदी समेत सारे प्रांतीय भाषा अपनी पहचान बनाए रखने के लिए बहुत सारी मुश्किलों और चुनौतियों का सामना कर रही है। जिन पर खासतौर से ध्यान देने की जरूरत है।

 

ग्लोबल विलेज दौर में हम हिंदी पर गर्व तो करते हैं लेकिन उसे आत्मविश्वास के साथ परीक्षा का माध्यम बनाने से डरते भी हैं। उनके भीतर का यह डर अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के कारण है। यही कारण है कि आज भी हिंदी को उसका उचित स्थान दिलाने को लेकर समय-समय पर आवाज उठते रहते हैं।

 

विश्व के सभी देशों की अपनी एक भाषा ऐसी होती जो संपूर्ण राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधने की क्षमता रखती है और वह क्षमता हिंदी में है। हिन्दी को राजभाषा घोषित करने से पहले ही, बहुत ही विरोध का सामना करना पड़ा इसके अलावा हिन्दी के साथ अंग्रेजी भाषा को १५ साल के लिए राजभाषा के रूप में जगह दी गई। जिसका परिणामस्वरूप यह हुआ कि कुछ राज्यों ने अंग्रेजी को ही, आज तक राजभाषा बनाये रखा है। इसके बावजूद भी आज हिन्दी, अंग्रेजी, चीनी और फ्रेंच भाषाओं के साथ दुनिया में सबसे अधिक बोलचाल में लायी जाने वाली भाषा है। 

 

वैसे यदि यदि पिछले कुछ वर्षों का आंकलन करें तो हिंदी की बेहतर स्थिति नजर आती है। यह आम बोलचाल की भाषा बन गई है। उत्तर भारत को छोड़ दे तो पहले देश में अधिकांश हिस्सों में हिंदी को जानने और समझने वाले लोगों की संख्या के बराबर थी। ठीक इसके विपरीत आज पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु, असम, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मणिपुर, मेघालय केरल आदि राज्यों में भी हिंदी भाषा बोलने और समझने वाले लोगों की संख्या बहुतायत में हैं। देश के अधिकांश राज्यों में हिंदी भाषा को प्राथमिक शिक्षा तक अनिवार्य कर दिया है यदि देखा जाए तो पिछले ७० वर्षों में आम बोलचाल की भाषा में हिंदी का प्रचार बड़ा है  

 

भारत में आज लगभग ६५० से अधिक जीवित भाषाएँ है परंतु भारत वर्ष में आज संपर्क की भाषा के रूप में हिन्दी, अंग्रेजी, और स्थानीय भाषाओं को ही प्रयोग में ही लाया जाता है। हिन्दी भाषा को भारत में तीन चौथाई लोग बोलते और समझते है। हिन्दी भारत के १२ राज्यों की प्रथम भाषा है। 

 

विश्व की बात करें तो दुनिया में प्रायः ८० करोड़ लोग ऐसे हैं जो हिंदी बोल या समझ सकते हैं। भारत के बाहर हिंदी जिन देशों में बोली जाती है, उनमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार, इंडोनेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, चीन, जापान, ब्रिटेन, फिजी, जर्मनी, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, मॉरिशस, यमन, युगांडा, त्रिनिदाड टोबैगो, कनाडा, फिजी, मालेशिया आदि देश शामिल हैं।

 

गैर-हिन्दीभाषी क्षेत्र अथवा हिंदी भाषी क्षेत्र हो, इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इक्कीसवीं सदी में कोई भी भाषा सुरक्षित नहीं है और जिसको चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ रहा हो।

 

हिंदी अपनी पहचान बनाए रखने के लिए बहुत चुनौतियों का सामना कर रही हैं। निम्नलिखित कुछ बिंदु सार्विक रुप से हिंदी भाषी और गैर हिंदी भाषी क्षेत्र, दोनों पर भी लागू होती हैं।

 

) भारत एक बहु भाषीय देश है जहाँ पर बहुत सी भाषाएँ बोली जाती है। यहाँ के हर राज्य की अपनी एक अलग भाषा है। बढ़ती हुई अंग्रेजी मानसिकता के कारण लोग अपने प्रांतीय भाषा यानि कि मातृभाषा से भी ज्यादा अंग्रेजी की अधिक महत्व देने लगी है। ऐसे परिस्थितियों में हिंदी भाषा के लिए भी एक बड़ी चुनौती आना स्वाभाविक है।

 

) कंप्यूटर एवं डिजिटल दुनिया आज की शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। समय के साथ-साथ शैक्षिक प्रणाली में भी परिवर्तन हुए हैं, और इस प्रणाली को डिजिटल प्रौद्योगिकी से जोड़ा गया है। बिशेषत करोना-काल में आनलाइन अध्ययन के लिए कंप्यूटर के आवश्यकता बढ़ गई। इसलिए, आज के दौर में वही भाषा जिंदा रहेंगी जो अपने आप को बदलते हुए इलेक्ट्रॉनिक और तकनीकि पटल के साथ जुड़ने की क्षमता रखती हैं। 

 

) पाश्चात्यबादी अंग्रेजी मानसिकता आजादी के इतने वर्षों बाद भी हमें अंग्रेजी सभ्यता - संस्कृति अच्छी लगती है। बाकी सारी परंपराएँ व्यर्थ लगती है। यहाँ के लोग अंग्रेजी बोल कर स्वयं को ऊँचा समझते हैं जब तक इस मानसिकता को नहीं बदला जाएगा तब तक हिंदी के सामने चुनौतियां आती रहेंगी।

 

) भ्रष्ट राजनीति के कारण हिंदी- अहिंदी विवाद को लेकर भारतीय राजनेताओं ने अनेक आंदोलन किए। कई राज्यों में दुष्प्रचार किया गया की हिंदी थोपी जा रही है परिणाम स्वरूप वोट प्रेमी सरकारों ने हिंदी को बलात थोपने की नीति अपनाई।

 

) सरकारी अफ़सर शाही - सरकारी अफसरशाही भी हिंदी की हीन दशा के लिए चुनौती है। आजादी के बाद सरकार के बड़े बड़े अधिकारियों ने जानबूझकर हिंदी की बजाय अंग्रेजी का वर्चस्व बनाए रखा।

 

) साहित्य को खरीदने में रुचि होना और ग़ैर हिंदी भाषी क्षेत्र में हिंदी पत्र -पत्रिकाएं, अच्छे साहित्य में श्रेष्ठ पठनीय सामग्री का अभाव है। 

 

) प्रांतीय भाषाओं से भी कड़ी चुनौतियाँ मिल रही हैं इन भाषाओं में प्रतिस्पर्धा का माहौल है जिसके कारण वे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हिंदी भाषा की प्रचार-प्रसार बाधा प्राप्त हो रही हैं

 

) प्रीन्ट, इलेक्ट्रॉनिक और सोसियेल मीडिया अपने लाभ के लिए हिंग्लिश का प्रचार- प्रसार कर रही है हिंग्लिश के कारण हिंदी के समक्ष अपनी शुद्धता को बनाए रखने की चुनौती सामने गयी है।

 

) चित्रपट के कारण हिंदी का प्रचार-प्रसार हुआ और इसमें कोई दो राय नहीं, परंतु चित्रपट में हिंदी भाषा के साथ अंग्रेजी भाषा के प्रयोग के कारण भाषा में अशुद्धता गई है और हिंदी को शुद्धता को संभाले रखना एक चुनौती बन गई है

 

) हिंदी साहित्य एवं शैक्षिक पाठ्यक्रम के पुस्तक आदि इतना पर्याप्त नहीं है कि पाठकों की माँग को पूरा किया जा सके।

 

१०) गवेषणा एवं अनुसंधान के लिए हिंदी भाषा में शोध अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं है इस चुनौती का सामना भी हिंदी को करना पड़ रहा है। अंग्रेजी भाषा मे उपलब्ध अध्ययन सामग्री का उपयोग विद्यार्थी करते हैं।

 

११) नीचात्मिकताबोध के कारण अपने स्तर की चिंता लोगों को बहुत है। लोग अंग्रेजी बोलने में बड़ा गर्व अनुभव करते हैं। हिंदी के प्रति श्रद्धा तो है किंतु गर्व का भाव नहीं है। जब तक गर्व नहीं होगा हिंदी के प्रति यह चुनौती भी सदैव ही रहेगी।

 

१२) लोगों की मानसिकता ऐसी बन गई है कि अंग्रेजी बोलने और लिखने वाले ही पढ़े लिखे होते हैं हिंदी बोलने और समझने वाले, लिखने वाले उनकी दृष्टि में पढ़े -लिखे नहीं होते इस मानसिकता को भी बदलने की आवश्यकता है। यह मानसिकता चुनौती दे रही है।

 

१३) असमंजस मानसिकता के तात्पर्य है कि लोग दिखावे के लिए तो कहते है हिंदी को राष्ट्रभाषा होनी चाहिए हिंदी का प्रयोग करना चाहिए किंतु जब इंग्लिश नहीं आती तो अपने आप को शर्मिंदा महसूस करते हैं और इंग्लिश बोलने वालों का सम्मान करते हैं इस चुनौती के सामने हिंदी दया की पात्र बन जाती है।

 

१५) पुस्तकें उपलब्ध होना--विज्ञान तकनीकि क्षेत्र में हिंदी भाषा की उच्च कोटि की पुस्तकें उपलब्ध नहीं है।

 

१६) हिंदी भाषा के कार्यक्रमों में हिंदी भाषा से प्राप्त उपलब्धियों को प्रोत्साहन नहीं दिया जाता। इससे व्यक्ति निराश हो जाता है। ये भी वर्तमान में एक चुनौती बनकर उभर रही हैं।

 

१७) सरकारी एवं व्यक्तिगत खण्ड पर हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी भाषा की पालड़ा अभी भी भारी है। आज़ादी के ७४ साल के बाद भी सरकारी अधिकारियों की मंशा - ये बड़े - बड़े अधिकारी कभी नहीं चाहते कि हिंदी भाषा का वर्चस्व स्थापित हो अपनी झूठी शान के चक्कर में हिंदी की उपेक्षा करते हैं। ऐसे स्थिति में एक गैर हिंदी क्षेत्र के छात्र स्वाभाविक रूप से हिंदी के प्रति कम आकर्षित होते हैं।

 

१८) ग़ैर हिंदी लोगों को हिंदी सीखने और बोलने के लिए प्रेरित करने के लिए हिंदी को रोजगार की भाषा बनाई जाये ताकि इसके प्रति लोग आकर्षित हो और हिंदी की पढ़ाई के प्रति रुचि जागृत हो

 

१९) ग़ैर- हिंदी भाषी एक साधारण छात्र के लिए विज्ञान तकनीकी बिषय की अध्ययन सामग्री, पुस्तक आदि पर्याप्त रुप से उपलब्ध होने के कारण हिंदी माध्यम में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या कम होती जा रही है। उन्हें हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में अंग्रेजी ज्यादा उत्कृष्ट माध्यम लगता है। 

 

हिंदी में विज्ञान तकनीकी भाषा बनाई जाए इससे संबंधित अध्ययन सामग्री उपलब्ध करवायी जाये।

 

२०) हिंदी में पढ़ने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर रोजगार मिलने की अवसर सीमित है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी माध्यम में उच्च शिक्षित बच्चों को रोजगार सुनिश्चित नही होता है। 

 

हिंदी में पढ़ने और पढ़ाने के अवसर प्राप्त करने अलग-अलग स्थानों पर, अलग अलग बिषय पर विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाए तथा लोगों को वहाँ रोजगार उपलब्ध करवाएँ जाएँ।

 

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी आम भाषा थी। वल्लभभाई पटेल, गांधी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे कई गैर-देशी हिंदी वक्ताओं ने हिंदी का समर्थन किया। यह बहुत निराशाजनक लग रहा है जब वर्तमान राजनेता हिंदी भाषा बोलने या प्रयोग करने के आधार पर राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर राजनीति करते हैं। सरकारी स्तरों के साथ-साथ आम आदमी के स्तर पर हिंदी भाषा को लोकप्रिय बनाने और बढ़ावा देने के लिए गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए।  हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए, गैर-हिंदी राज्यों में हिंदी को बढ़ावा देने और बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए। 

 

 

लेखक:

संजीव मजुमदार

उप-महाप्रवंधक (उत्पादन)

मुख्य अधिकारी, कृत्रिम उत्तोलन विभाग

राजामुंदरी परिसम्पत्ति

 

 

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